Monday, 5 May 2014

इन तमाम पहलुओं पर गौर से विचार करने के बाद यह पता चलता है कि आजादी के करीब ६७ वर्ष बीत जाने के बावजूद भी अगर किसी को सरकारी खजाने से या राज्यकोष से वंचित रखा गया है तो वह है 'मतदाता'  जबकि 'मतदाता' हमारी सारी प्रक्रिया के अन्दर एक 'अहम् कड़ी' अथवा 'नींव का पत्थर है' l अगर मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करे तो हमारी सारी व्यवस्था ही तहस नहस हो जायेगी अथवा चरमरा जायेगी l लेकिन इसके बावजूद आज तक किसी भी सरकार ने मतदाता की इस अहम् भूमिका के लिए उसे कभी कोई त्वजो नहीं दी l उस मतदाता के मत देने के कारण ही एक व्यक्ति 'विधायक' या 'सांसद' बन जाता है तथा राज्यकोष से भारी भरकम सुख सुविधाएँ हासिल करने का अधिकार प्राप्त कर लेता है l

इस प्रकार जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि तत्काल प्रभाव से राज्यकोष से डेढ़ से दो लाख रूपये महीने के प्राप्त करने का हकदार हो जाता है l मगर जिसने उसे वहां तक पहुचाया है उस व्यक्ति की किसी ने आज तक सुध नहीं ली अर्थात 'मतदाता' को हमेशा सरकारी खजाने से मिलने वाली इस प्रकार की किसी भी सुविधा से वंचित रखा गया है l इसलिए अब यह निर्णय लिया गया है कि 'मतदाता राज' की अथवा जनता की अपनी सरकार बनने पर ६० दिन के अन्दर अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को (चाहे उसने मत किसी के भी पक्ष में डाला हो) आधिकारिक तौर पर ५,०००/- रूपये का भुगतान सरकारी खजाने से किया जायेगा l क्योंकि उस व्यक्ति ने भारतीय संविधान के तहत अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपनी ड्यूटी अथवा अपने कर्तव्य का पालन किया है l इस दिन मतदाता अपने सारे काम छोड़ कर ३ से ४ घंटे लाइन में खड़ा होकर अपने इस कर्तव्य को निभाता है l इसके अतिरिक्त वह अपने 'वोटर कार्ड' या 'पहचान पत्र' (जो कि एक सरकारी दस्तावेज है) को भी पांच साल तक संभाल कर रखता है अथवा उसका चौकीदारा करता है l अतः इस सरकारी ड्यूटी को करने के लिए मतदाता को कम से कम ५,०००/- रूपये के मानदेय का भुगतान करना बिल्कुल जायज है जोकि उस द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि के केवल एक दिन के वेतन के बराबर है जिसे वह विधायक या सांसद लगातार १८२६ दिन तक प्राप्त करता है l

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